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शिल्प एवं वास्तुकला तथा वर्ण-व्यवस्था

कितने आश्चर्य की बात है। जो जाति स्थापत्य कला सृजनात्मक विकास के भवननिर्माणकला, मूर्ति कला,चित्रकारी की सृजन रही हो। जिसको लोग अपने नये भवन के निर्माण की नींव रखते समय विश्वकर्मा  मानकर पूजते हो, वह जाति अन्य समाज का हिस्सा केसे हो गई, इसी बात के शोध से यह मालूम हुआ।कि इतिहासकारो ने अपनी ब्राहमणवादी व्यवस्था के अनुरूप  आर्य सभ्यता से ही इस जाति व्यवस्था के साथ बडा भद्दा मजाक किया है। जो एक परशनचिनह है।उन्होंने कला व शिल्प के सृजन करताऔ का संबंध सवर्ण के साथ नही रखा,यहा तक कि भगवान विश्वकर्मा को भी सवर्ण नही माना,क्योंकि इन्हे मालूम था, शिल्पीवत की कला के पारखी  सभ्यता के रचनाकार है।और इनको महामंडित कर दिया तो हमारी चूले हिल जायेगी। इसीलिए सृजन कार्यो के काम करने वाली जातियो को चौथे नंबर पर रखा गया।जबकि शिल्पीवत कलाकार आदिकाल से ही सभ्यता और संस्कृति की कहानी कह रहे है।जो पुरातत्व सर्वेक्षण मै  सत्य पाया गया है।जब पुरातत्व खुदाई मै प्राप्त ईटी सभ्यता की सूचक है।तो वास्तु अनुसार निर्माण उसकी उचाई का कीर्तिमान स्थापित कर रहे है।किंतु उस समय की ब्राहमणवादी व्यवस्था को य...

कुमावत गौरव मंडन के प्रति ब्राह्मणों का षड्यंत्र

भारतीय स्थापत्य कला के शिल्पकारो में महान शिल्पी,वास्तु शास्त्र के महा पंडित मंडन खनारिया(सलावट) महाराणा कुंभा के राज शिल्पी थे,खेता सलावट का बडा पुत्र मंडन वास्तु शास्त्र व शिल्प शास्त्र के अलावा शास्त्र प्रणेता भी थे,भारतीय इतिहास में इसे लिखा भी गया है। किन्तु उन्हें सलावट(कुमावत) की जगह पंडित बना कर पेश किया गया है। जबकि चित्तोड के सलावट मोहल्ले में इनके वंशज आज भी निवास कर रहे हैं। जो खनारिया गोत्र के कुमावत है,शिल्पी खेता स्वयं वास्तु शास्त्र व शिल्प शास्त्र का बडा विद्वान रहा है। इनके दो पुत्र मंडन व नाथा हुए मंडन के दो पुत्र गोबिंद व ईश्वर व ईश्वर के पुत्र का नाम छीतर था,पर ख्याति मंडन को मिली, इतिहास मंडन को गुजरात से मैवाड बुलाना बता रहा है। जो पूर्णतः असत्य है, खुद मंडन ने अपने ग्रंथ रूपमंडन मै लिखा है। की वह मैवाड का निवासी हैं।***श्रीमद्देशे मेदपाटाभिगाने क्षैत्राख्यो$भूत सूत्रधारो वरिष्ठ,, पुत्रो ज्योष्ठो मंडनस्तस्य तेन प्रोक्त शास्त्र मंडन रूपपूर्वम,,  कुछ इसी तरह एक अन्य ग्रंथ में लिखा है। खेता का ज्येष्ठ पुत्र मंडन महाराणा कुंभा के शासनकाल में विख्यात हुआ  श्...

मंडन - परिचय

भारतीय स्थापत्य कला के शिल्पकारो में महान शिल्पी,वास्तु शास्त्र के महा पंडित मंडन खनारिया(सलावट) महाराणा कुंभा के राज शिल्पी थे,खेता सलावट का बडा पुत्र मंडन वास्तु शास्त्र व शिल्प शास्त्र के अलावा शास्त्र प्रणेता भी थे,भारतीय इतिहास में इसे लिखा भी गया है। किन्तु उन्हें सलावट(कुमावत) की जगह पंडित बना कर पेश किया गया है। जबकि चित्तोड के सलावट मोहल्ले में इनके वंशज आज भी निवास कर रहे हैं। जो खनारिया गोत्र के कुमावत है,शिल्पी खेता स्वयं वास्तु शास्त्र व शिल्प शास्त्र का बडा विद्वान रहा है। इनके दो पुत्र मंडन व नाथा हुए मंडन के दो पुत्र गोबिंद व ईश्वर व ईश्वर के पुत्र का नाम छीतर था,पर ख्याति मंडन को मिली, इतिहास मंडन को गुजरात से मैवाड बुलाना बता रहा है। जो पूर्णतः असत्य है, खुद मंडन ने अपने ग्रंथ रूपमंडन मै लिखा है। की वह मैवाड का निवासी हैं।***श्रीमद्देशे मेदपाटाभिगाने क्षैत्राख्यो$भूत सूत्रधारो वरिष्ठ,, पुत्रो ज्योष्ठो मंडनस्तस्य तेन प्रोक्त शास्त्र मंडन रूपपूर्वम,,  कुछ इसी तरह एक अन्य ग्रंथ में लिखा है। खेता का ज्येष्ठ पुत्र मंडन महाराणा कुंभा के शासनकाल में विख्यात हुआ  श्...

गजधर की उपाधि

स्थापत्य निर्माण कला की उपाधि "गजधर" अतार्थ गज को धारण करने वाला, सूत,गुणिया सावल, की वास्तु का ज्ञाता, जो इस स्थापत्य निर्माण कला की शिक्षा का पुर्ण ज्ञान रखता हो, वह गजधर कहलाता है। किसी नगर गांव या महलो के नव निर्माण की योजना बना कर उसके निर्माण की जुमैदार अपने कंधो पर निभाता हो । वह इस सम्मान को पाता है। आज की तरह पुराने जमाने मै ना तो कोई आई आई टी होते थे और ना ही इंजीनिरिग कालेज जहा से पढाई कर नव निर्माण की योजना बना सके या नियोजक कला का ज्ञाता हो, यह संपुर्ण काम कुम ावत जाति के शिलपकारो द्वारा किया जाता था। अपनी युगायुगीन शिल्प साधना और स्थापत्य कला की मज) पकड के दम पर,नगर गांव या महलो,गढ किले, के निर्माण के ज्ञाता रहे है।इस जाति के जिस व्यक्ति को गज,सूत,गुणिया,सावल, की नाप पर अच्छी पकड़ होती थी, वह तत्कालीन सासन से गजधर की उपाधि प्राप्त करता था।अभ्यस्त गजधर अपने हुनर से गुरू शिष्य परंपरा के अनुसार अपने काम को एक हाथ से दूसरे हाथ को काम सिखाकर जोडीदार बनाकर काम को पुरा करने की महारथ हासिल करता था।सफल गजधर वही कहलाता था, जो अपने स्तर के साथियो का निर्म...

कुंभा स्वामी मंदिर : चितौडगढ

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चितौडगढ किले मै स्थित विजय स्तंभ के बाद यदि कोई भव्य स्थान है तो वह है कुंभा स्वामी मंदिर जिसे मीरा मंदिर के नाम से भी जाना जाताहै। इस मंदिर का निर्माण महाराणा कुंभा ने 1444 मै अपनी झाली,रानी के लिए करवाया था। इस मंदिर के मुख्य शिल्पी केलदा मेहरांडा था, जो प्रख्यात शिल्पी दीपा,(देवा) का वंशज था इसके अतिरिक्त श्रीबगड,बामणिया,फता , ठाकरा , मान॔णनिया रामानुज, गुणजी, थे।शिल्पी केलदा मेहरांडा स्तम्भ निर्माण मै बडा दक्ष था, बागड व फता मूर्ति कला का ज्ञाता थे,तथा हमीर को मुर्तियो के चेहरे बनाने की महारत हासिल थी, इन सभी शिलपकारो ने इन मंदिरो को दो वर्ष मै पुर्ण कर दिया था, ऐसी जानकारी है आज जो विजय स्तंभ के पास जो तराशे हुऐ अवशेष दिखाई देते है। वहा इन शिल्पीयो द्वारा कोई भव्य मंदिर का निर्माण किया जाना था, जो समयकाल के कारण पूरा नही हो सका, किंतु यह सब अवशेष कुमावत जाति की परंपरागत अदभुत स्थापत्य निर्माण शैली के गवाह है

सामोद का महल

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कुमावत समाज की अदभुत स्थापत्य कला का नमूना, सामोद का महल, 19 वी सदी मै जयपुर के एक जागीरदार रावल शयो सिह जी इसका जिणोउदधार करवा था, इस महल की सुंदर नक्काशी,चित्रकारी, और शीश महल का काम देखते ही बनता है।लगभग 175 वर्ष पुरानी कलाकारी आज भी नई दिखाई देती है। हमारे समाज बंधुऔ ने इसकी नक्काशी मै नेचुरल रंगो का स्तेमाल किया था, जिसको बनाने मै इनके महारथ हासिल थी, हमारे वंशजों के कामो पर हमे गर्व है।

सोने की कलमकारी की मारोठ कला : उस्ता स्व. श्री घासीलाल जी तोंदवाल

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कुमावत समाज के अनमोल रत्न उस्ता आदरणीय सवः श्री घासी,लाल जी तोंदवाल,मारोठ कला के पुरोधा,जिन्होंने काँच व सोने की कलमकारी की मारोठ कला को निखारने मै महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस कला को देश के कई स्थानो पर फैलाया है।आपके द्वारा बंगाल, बिहार, आसाम नागालैंड, के अनेक जैन मंदिरो मै वहा की स्थानीय कला का समावेश कर काँच वह सोने की कलमकारी की बारीकियो को आत्मसात कर मारोठ कला को नई उंचाई प्रदान की है। इसी तरह म,प, के रामगढ,भोपाल,पेटलावद कुक्षी आदि स्थानो मै कोई जैन मंदिरो मै चित्रकारी का काम किया है। जिसके कारण जैन समाज मै आपका बडा सम्मान रहा है।ये जो फोफोटो यह भी आपकी ही बनाई हुई है। आपके कला के साथ ही स्वतंत्रता सेनानी भी रहे है। महात्मा गांधी,वह सुभाष चंद्र बोस के प्रति आपकी निष्ठा रही है। इसीलिए आपने अपने पुत्र का नाम सुभाष रखा था, जिन्होंने इस कला को विश्व स्तर पर ख्याति दिलवाई है ऐसे महान कला विद परदे समाज को गर्व है।