शिल्प एवं वास्तुकला तथा वर्ण-व्यवस्था
कितने आश्चर्य की बात है। जो जाति स्थापत्य कला सृजनात्मक विकास के भवननिर्माणकला, मूर्ति कला,चित्रकारी की सृजन रही हो। जिसको लोग अपने नये भवन के निर्माण की नींव रखते समय विश्वकर्मा मानकर पूजते हो, वह जाति अन्य समाज का हिस्सा केसे हो गई, इसी बात के शोध से यह मालूम हुआ।कि इतिहासकारो ने अपनी ब्राहमणवादी व्यवस्था के अनुरूप आर्य सभ्यता से ही इस जाति व्यवस्था के साथ बडा भद्दा मजाक किया है। जो एक परशनचिनह है।उन्होंने कला व शिल्प के सृजन करताऔ का संबंध सवर्ण के साथ नही रखा,यहा तक कि भगवान विश्वकर्मा को भी सवर्ण नही माना,क्योंकि इन्हे मालूम था, शिल्पीवत की कला के पारखी सभ्यता के रचनाकार है।और इनको महामंडित कर दिया तो हमारी चूले हिल जायेगी। इसीलिए सृजन कार्यो के काम करने वाली जातियो को चौथे नंबर पर रखा गया।जबकि शिल्पीवत कलाकार आदिकाल से ही सभ्यता और संस्कृति की कहानी कह रहे है।जो पुरातत्व सर्वेक्षण मै सत्य पाया गया है।जब पुरातत्व खुदाई मै प्राप्त ईटी सभ्यता की सूचक है।तो वास्तु अनुसार निर्माण उसकी उचाई का कीर्तिमान स्थापित कर रहे है।किंतु उस समय की ब्राहमणवादी व्यवस्था को य...